स्त्री-समानता के अग्रदूत: महात्मा बसवेश्वर और सामाजिक पुनर्जागरण

Authors

  • प्रा. आशा शिवाजी गायकवाड Author

Abstract

प्रस्तुत शोध-पत्र 12वीं शताब्दी के महान क्रांतिकारी संत महात्मा बसवेश्वर के स्त्री-मुक्ति विषयक विचारों और कार्यों का ऐतिहासिक एवं वैचारिक विश्लेषण करता है। मध्यकालीन भारत के उस अंधकारमय युग में, जहाँ स्त्रियों को धार्मिक और सामाजिक रूप से शूद्रों के समकक्ष मानकर दासता की बेड़ियों में जकड़ा गया था, बसवण्णा ने उन्हें 'शरण' के रूप में एक नई पहचान और मानवीय गरिमा प्रदान की।

यह शोध-पत्र स्पष्ट करता है कि बसवेश्वर ने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि 'अनुभव मंटप' जैसे लोकतांत्रिक मंच के माध्यम से स्त्रियों को वैचारिक नेतृत्व और आध्यात्मिक अधिकार प्रदान किए। उन्होंने मासिक धर्म और प्रसव जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं से जुड़ी 'अपवित्रता' की मान्यताओं को सिरे से नकारते हुए स्त्रियों को इष्टलिंग धारण करने का अधिकार दिया। उनके द्वारा प्रोत्साहित विधवा विवाह और 'कायक' (श्रम) के माध्यम से आर्थिक स्वावलंबन के प्रयास, आधुनिक नारीवाद के विचारों से कई सदियों पहले के क्रांतिकारी कदम थे। यद्यपि सनातनी प्रवृत्तियों ने उनके मूल क्रांतिकारी विचारों को संकुचित करने का प्रयास किया, परंतु उनका 'मानवतावादी' दृष्टिकोन आज भी आधुनिक सामाजिक न्याय और स्त्री-पुरुष समानता के लिए एक वैश्विक मार्गदर्शक सिद्धांत बना हुआ है।

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Published

2026-03-19

How to Cite

स्त्री-समानता के अग्रदूत: महात्मा बसवेश्वर और सामाजिक पुनर्जागरण. (2026). IIP: World Journal of Humanities and Social Sciences, 2(Issue - I (January-March). https://iipublications.com/iipwjhss/article/view/370